नृत्य एवं शास्त्रीय कला डेस्क। भारतीय शास्त्रीय नृत्य केवल दैहिक सौंदर्य या शारीरिक लचक का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह ‘नाट्यशास्त्र’ के प्रणेता महर्षि भरत मुनि द्वारा प्रतिपादित पंचम वेद की साक्षात साधना है। उत्तर भारत की गंगा-जमुनी तहजीब और मंदिर परंपरा से निकला ‘कथक’ हो या तमिलनाडु के भव्य देवालयों में देवदासियों की साधना से विकसित ‘भरतनाट्यम’—दोनों ही नृत्य शैलियां नवरसों, भावभंगिमाओं और पैरों के घुंघरुओं की झंकार से सनातन आख्यानों और भक्ति की पराकाष्ठा को साकार करती हैं।
‘कथा कहे सो कथक कहावे’: कथावाचन से शास्त्रीय गरिमा तक
कथक का मूल प्राचीन काल के उन कथाकारों में है जो गांवों और मंदिरों में घूम-घूम कर भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की लीलाओं को गाकर और अभिनय करके सुनाते थे। इसके तीन प्रमुख अंग—नृत्त (शुद्ध लयकारी और चक्कर), नाट्य (कथा प्रसंग) और नृत्य (भाव और हस्तमुद्राएं)—श्रोता को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। लखनऊ और बनारस घरानों ने इसमें सूक्ष्म अभिनय और नजाकत का ऐसा रंग भरा जो आज विश्वभर के मंचों पर सराहा जाता है।
वहीं भरतनाट्यम अपनी दृढ़ ज्यामितीय मुद्राओं (अरमंडी), अग्नि तत्व के प्रतीक और तांडव-लास्य के संतुलन के लिए विख्यात है। यह नृत्य सीधे परमात्मा के प्रति आत्मा के समर्पण (भक्ति मार्ग) की अभिव्यक्ति है।
“यतो हस्तस्ततो दृष्टिर्यतो दृष्टिस्ततो मनः। यतो मनस्ततो भावो यतो भावस्ततो रसः॥ जहां हाथ जाते हैं वहां दृष्टि, जहां दृष्टि वहां मन, जहां मन वहां भाव और जहां भाव होता है वहीं रस की निष्पत्ति होती है।”
— अभिनय दर्पण
कथक और भरतनाट्यम के प्रमुख आध्यात्मिक आयाम
- हस्तमुद्राओं की गूढ़ भाषा: 28 असंयुक्त और 24 संयुक्त मुद्राओं के जरिए बिना एक शब्द बोले संपूर्ण रामायण और महाभारत का मंचन।
- ताल और लयकारी का गणित: तीनताल, झपताल और रूपक ताल में तिहाइयों और टुकड़ों का अचूक गणितीय निरूपण।
- नवरसों का सजीव प्रकटीकरण: श्रृंगार, वीर, करुण, हास्य, रौद्र, भयानक, वीभत्स, अद्भुत और शांत रसों की भावपूर्ण प्रस्तुति।
- सांस्कृतिक एकता का सेतु: उत्तर का कथक और दक्षिण का भरतनाट्यम मिलकर ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ करते हैं।
वैश्विक मंचों पर सनातन कला का डंका
आज लंदन, न्यूयॉर्क, पेरिस और तोक्यो के प्रतिष्ठित कला केंद्रों में हजारों विदेशी विद्यार्थी कथक और भरतनाट्यम की कठिन साधना कर रहे हैं। यह भारत की सॉफ्ट पावर का सबसे सशक्त उदाहरण है।
राष्ट्रवाक् दृष्टि: भारतीय शास्त्रीय नृत्य दैहिक गति के माध्यम से आत्मिक मुक्ति की अलौकिक यात्रा है। यह हमारी सनातन संस्कृति का देदीप्यमान मुकुट है।


