‘लोक परंपराओं को मुख्यधारा में लाना ही उद्देश्य’: पुष्कर से शुरू हुआ लोकमंथन यात्रा का तीसरा चरण

राजस्थान के पवित्र तीर्थ पुष्कर से लोकमंथन यात्रा के तीसरे चरण का भव्य शुभारंभ हुआ। लोक परंपराओं, जनजातीय संस्कृति और देशज कलाओं को राष्ट्रीय विमर्श में मिला सम्मान।

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Oct 9, 2026, 08:24 pm IST
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पुष्कर ब्यूरो। राजस्थान के पावन ब्रह्मतीर्थ पुष्कर की पावन धरा से ‘लोकमंथन यात्रा’ के तीसरे चरण का शंखनाद हुआ। देश के विभिन्न अंचलों से आए लोक कलाकारों, जनजातीय समाज के प्रमुखों और संस्कृतिविदों की उपस्थिति में इस यात्रा को रवाना किया गया। इस राष्ट्रीय यात्रा का मुख्य ध्येय उन उपेक्षित लोक कलाओं, वाचिक परंपराओं और सांस्कृतिक अनुष्ठानों को मुख्यधारा के विमर्श में स्थापित करना है, जो सदियों से भारत की सांस्कृतिक निरंतरता की संवाहक रही हैं।

‘लोक’ ही भारत की वास्तविक आत्मा है

समारोह के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि भारत को केवल महानगरों या पश्चिमी चश्मे से नहीं समझा जा सकता। भारत की वास्तविक मेधा हमारे गांवों, वनांचलों और लोकगीतों में रची-बसी है। अंग्रेजों की औपनिवेशिक शिक्षा ने हमारे ‘लोक’ को पिछड़ा और अंधविश्वासी बताकर उपहास उड़ाया, जबकि वास्तविकता यह है कि हमारे लोक आचार में पर्यावरण संरक्षण, सामुदायिक सहयोग और वैज्ञानिक जीवनशैली के गहरे सूत्र समाए हुए हैं।

पुष्कर से प्रारंभ होकर यह यात्रा राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के 50 से अधिक सांस्कृतिक केंद्रों से गुजरेगी, जहां स्थानीय लोक कलाकारों के साथ संवाद और कला प्रदर्शनियों का आयोजन होगा।

“लोक परंपराएं कोई पुरानी धरोहर की वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि वे जीवित जीवन दर्शन हैं। जब तक हमारा लोक सजीव है, तब तक भारत की आत्मा को कोई पराजित नहीं कर सकता।”

— यात्रा संयोजक, प्रज्ञा प्रवाह

लोकमंथन यात्रा के प्रमुख उद्देश्य

  • देशज ज्ञान का दस्तावेजीकरण: औषधीय जड़ी-बूटियों, जल संचयन की पारंपरिक पद्धतियों और लोक शिल्पों का वैज्ञानिक संकलन।
  • जनजातीय नायकों का स्मरण: स्वाधीनता संग्राम में जनजातीय वीरों के योगदान को लोकगीतों और नाटकों के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाना।
  • विलुप्त हो रही कलाओं का संरक्षण: कठपुतली, कालबेलिया, मांडना और लोक वाद्ययंत्रों के कलाकारों को मंच और आर्थिक सहयोग।
  • औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति: भारतीय लोक संस्कृति को हीन मानने के पश्चिमी नैरेटिव को समाप्त करना।

सांस्कृतिक एकात्मता की नई लहर

पुष्कर के सरोवर तट पर विभिन्न राज्यों के लोक नर्तकों ने जब ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की धुन पर समां बांधा, तो उपस्थित जनसमूह भावविभोर हो उठा। यह यात्रा भारत को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का महायज्ञ है।

राष्ट्रवाक् दृष्टि: लोक संस्कृति की अविरल धारा ही भारत को अखंड और जीवंत बनाए रखती है। लोकमंथन का यह अभियान सांस्कृतिक पुनर्जागरण का स्वर्णिम सेतु है।

Rastrawak editorial desk reporting on national perspective, culture, literature, and news.

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