संस्कृति एवं पर्व डेस्क, पटना/वाराणसी। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला सूर्य उपासना का महापर्व ‘छठ’ सनातन परंपरा का सबसे अनूठा, पावन और कठोर साधना का पर्व है। यह एकमात्र ऐसा पर्व है जहां केवल उगते हुए सूर्य की ही नहीं, बल्कि अस्ताचलगामी (डूबते हुए) सूर्य की भी उतनी ही श्रद्धा के साथ पूजा की जाती है। यह जीवन के हर पड़ाव का सम्मान करने और प्रकृति के प्रति अगाध कृतज्ञता व्यक्त करने का अप्रतिम लोक उत्सव है।
पर्यावरण, स्वच्छता और जल संरक्षण का संदेश
छठ पर्व की शुरुआत से ही नदियों, तालाबों और घाटों की साफ-सफाई में पूरा समाज स्वतः जुट जाता है। किसी भी मंदिर या पुरोहित की मध्यस्थता के बिना, सीधे प्रकृति (सूर्य देव और छठी मइया) की आराधना की जाती है।
पूजन सामग्री में प्रयुक्त होने वाली हर वस्तु—बांस का सूप, दौरा, मिट्टी के चूल्हे, गन्ना, ठेकुआ, अदरक, मूली और ताजे फल—सीधे मिट्टी और ग्रामीण श्रम से जुड़ी होती है। यह पर्व दर्शाता है कि प्रकृति का संरक्षण और उसकी पूजा ही मानव जीवन का वास्तविक आधार है।
“छठ केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के एकात्म होने का साक्षात्कार है। इसमें न कोई राजा है, न कोई रंक; घाट पर सब एक समान हैं।”
— लोक संस्कृतिविद्
छठ महापर्व के चार पावन सोपान
- नहाय-खाय (प्रथम दिवस): आत्मशुद्धि और सात्विक कद्दू-भात के भोजन से व्रत का संकल्प।
- खरना (द्वितीय दिवस): दिनभर निर्जला उपवास के बाद सायंकाल गुड़ की खीर का सात्विक प्रसाद ग्रहण।
- संध्या अर्घ्य (तृतीय दिवस): डूबते हुए भुवन भास्कर को पवित्र नदी के जल में खड़े होकर सूप से प्रथम अर्घ्य।
- उषा अर्घ्य व पारण (चतुर्थ दिवस): उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर 36 घंटे के कठोर निर्जला व्रत का पावन समापन।
सामाजिक समरसता का अद्वितीय महाकुंभ
छठ घाटों पर जाति, वर्ग और पद का भेद पूरी तरह समाप्त हो जाता है। सब एक साथ एक ही जल में खड़े होकर हाथ जोड़ते हैं। आज यह महापर्व बिहार और पूर्वांचल से निकलकर पूरे देश और दुनिया के कोने-कोने में अपनी सांस्कृतिक छटा बिखेर रहा है।
राष्ट्रवाक् दृष्टि: छठ पर्व प्रकृति, श्रम और सामाजिक समरसता की त्रिवेणी है। यह सनातन संस्कृति के उदात्त और वैज्ञानिक मूल्यों का अमर प्रतीक है।

