ज्योतिष एवं धर्म डेस्क। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की सर्वपितृ अमावस्या सनातन संस्कृति में पितरों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण दिन माना गया है। इस वर्ष सर्वपितृ अमावस्या शनिवार के दिन पड़ने से शनिश्चरी अमावस्या का दुर्लभ और अत्यंत पुण्यदायी महासंयोग बन रहा है। इस दिन ज्ञात और अज्ञात सभी पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने से पूरे वर्ष पितरों का आशीर्वाद बना रहता है।
पितृ तर्पण और सर्वपितृ अमावस्या की महत्ता
शास्त्रों के अनुसार, जो लोग किसी कारणवश पितृपक्ष के दौरान अपने पूर्वजों की पुण्यतिथि पर श्राद्ध नहीं कर पाते, वे यदि सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रद्धापूर्वक पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोज करा दें, तो उनके सभी पितर तृप्त होकर अपने लोक को प्रस्थान करते हैं और परिवार को सुख-समृद्धि का वरदान देते हैं।
शनि अमावस्या का संयोग होने से इस दिन शनिदेव की पूजा, पीपल वृक्ष की परिक्रमा और काले तिल, उड़द व सरसों के तेल का दान करने से शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैय्या से भी मुक्ति मिलती है।
“श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्। जो कुछ भी श्रद्धा से पितरों के निमित्त दिया जाता है, वही श्राद्ध है। श्रद्धा ही इस पूजा का मूल प्राण है।”
— स्मृति ग्रंथ
शुभ मुहूर्त और तर्पण की सरल विधि
- कुतुप काल (सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त): सुबह 11:46 से दोपहर 12:35 तक तर्पण और पिंडदान के लिए अति उत्तम समय।
- रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:35 से 01:24 तक श्राद्ध कर्म संपन्न किया जा सकता है।
- पंचबलि विधान: गौ ग्रास, श्वान (कुत्ता), काक (कौआ), देवादि और पिपीलिका (चींटी) को भोजन अर्पित करना अनिवार्य है।
- शनि शांति उपाय: सायंकाल पीपल वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाकर सात बार परिक्रमा करें।
पितृदोष निवारण और पारिवारिक शांति
इस दिन पवित्र नदियों में स्नान कर सूर्यदेव को अर्घ्य देना और असहायों को अन्न-वस्त्र का दान करना अनंत गुना फलदायी होता है। पितरों की कृपा से कुल में वृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
राष्ट्रवाक् दृष्टि: पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ही सनातन जीवन दृष्टि का आधार है। सर्वपितृ अमावस्या हमें अपने संस्कारों और जड़ों से जोड़ती है।

