कोलकाता विशेष ब्यूरो। पश्चिम बंगाल के राजनीतिक पटल पर एक युगांतरकारी घटनाक्रम में मुस्लिम बहुल रेजीनगर विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी ने अभूतपूर्व विजय प्राप्त की है। दशकों से एक परिवार और दल की जागीर समझी जाने वाली इस सीट पर विपक्षी दलों की जमानत जब्त होना यह दर्शाता है कि अल्पसंख्यक समाज का आम नागरिक अब तुष्टीकरण की राजनीति से ऊब चुका है और विकास की मुख्यधारा से जुड़ना चाहता है।
तुष्टीकरण का अंत और समावेशी विकास की विजय
रेजीनगर के मतदाताओं, विशेष रूप से महिलाओं और युवाओं ने खुलकर कहा कि दशकों तक धर्म के नाम पर उन्हें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया गया, जबकि इलाके में अच्छे स्कूल, अस्पताल और सड़कें तक नहीं बनीं। केंद्र सरकार की बिना भेदभाव वाली योजनाओं ने लोगों की आंखें खोल दी हैं।
मुफ्त राशन, पक्के आवास, आयुष्मान कार्ड और स्वच्छ भारत मिशन के शौचालयों का लाभ हर धर्म के गरीब को समान रूप से मिला। इसी विश्वास ने चुनावी नतीजों में ऐतिहासिक उलटफेर कर दिया।
“हमारा धर्म हमारे घर के भीतर है। बाहर जब हम निकलते हैं तो हमें अपने बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा चाहिए। विकास किसी धर्म का भेद नहीं करता।”
— स्थानीय मुस्लिम महिला मतदाता
रेजीनगर के चुनावी नतीजों के मुख्य निष्कर्ष
- तुष्टीकरण के मिथक का अंत: अल्पसंख्यक बाहुल्य क्षेत्रों में भी राष्ट्रवादी विकास नीति को व्यापक स्वीकार्यता।
- महिला सशक्तीकरण का प्रभाव: तीन तलाक की समाप्ति और जनकल्याणकारी योजनाओं से मुस्लिम बहनों का निर्भीक समर्थन।
- पारंपरिक दलों का सूपड़ा साफ: कांग्रेस और वामपंथियों की विभाजनकारी राजनीति को जनता ने पूरी तरह नकारा।
- कानून व्यवस्था की चाह: राजनीतिक हिंसा और सिंडिकेट राज से मुक्ति के लिए जनता का साहसिक कदम।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया संदेश
रेजीनगर का यह परिणाम केवल एक विधानसभा उपचुनाव का फैसला नहीं है, बल्कि यह समूचे पश्चिम बंगाल में बदलाव की उस बयार का प्रतीक है जो आने वाले समय में राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल देगी।
राष्ट्रवाक् दृष्टि: जब विकास सच्चा और नीयत साफ हो, तो वोट-बैंक की सारी दीवारें स्वतः गिर जाती हैं। रेजीनगर ने देश को नया मार्ग दिखाया है।

