राष्ट्रवाक् एक्सक्लूसिव, चित्रकूट। राजनीति के शीर्ष पर पहुंचकर सत्ता को तिनके के समान त्याग देने और जीवन का उत्तरार्ध सुदूर गांवों के उत्थान में समर्पित कर देने का जो अनुपम उदाहरण भारत रत्न नानाजी देशमुख ने प्रस्तुत किया, वह आधुनिक भारत के इतिहास में विरला है। चित्रकूट की पावन धरा पर नानाजी द्वारा स्थापित ‘दीनदयाल शोध संस्थान’ और ग्राम विकास का आत्मनिर्भर मॉडल आज देश और दुनिया के समाजशास्त्रियों के लिए गहन अध्ययन का विषय है।
नानाजी का स्वावलंबन दर्शन: ग्रामोदय से राष्ट्रोदय
नानाजी देशमुख का दृढ़ विश्वास था कि जब तक भारत का गांव आत्मनिर्भर, स्वावलंबी और विवाद-मुक्त नहीं होगा, तब तक भारत वास्तविक अर्थों में शक्तिशाली नहीं बन सकता। उन्होंने चित्रकूट के आसपास के 500 से अधिक गांवों को गोद लेकर एक ऐसी व्यवस्था विकसित की, जहां कोई भी किसान भूखा न सोए, कोई बच्चा अशिक्षित न रहे और कोई भी विवाद अदालत की चौखट तक न पहुंचे।
उन्होंने ‘विवाद मुक्त गांव’ की अवधारणा को साकार किया, जहां 90% से अधिक आपसी मतभेद गांव की चौपाल पर ही प्रेमपूर्वक सुलझा लिए जाते हैं। इससे ग्रामीणों का समय और धन कचहरियों के चक्कर से बचता है।
“अपने लिए जिए तो क्या जिए, तू जी किसी और के लिए। जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति के आंसू नहीं पोंछे जाते, तब तक हमारी साधना अधूरी है।”
— भारत रत्न नानाजी देशमुख
नानाजी के ग्राम विकास मॉडल के 4 प्रमुख आधार स्तंभ
- जल संचयन और उन्नत कृषि: छोटे बांधों, मेड़बंदी और जैविक खेती से बंजर भूमि को लहलहाते खेतों में बदला।
- ग्राम स्वास्थ्य और आयुर्वेद: ‘दादी मां का बटुआ’ अभियान के जरिए घर-घर में प्राथमिक आयुर्वेदिक उपचार की समझ पैदा की।
- गुरुकुल और स्वावलंबी शिक्षा: बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ हस्तशिल्प, कृषि और तकनीकी कौशल की व्यावहारिक शिक्षा।
- समाज शिल्पी दंपती योजना: शिक्षित युवा दंपतियों को गांवों में रहकर ग्रामीणों के साथ मिलकर काम करने के लिए प्रेरित किया।
21वीं सदी में नानाजी के विचारों की प्रासंगिकता
आज जब केंद्र सरकार ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ का आह्वान कर रही है, तो नानाजी का चित्रकूट मॉडल उसका सबसे जीवंत और व्यावहारिक खाका प्रस्तुत करता है।
राष्ट्रवाक् दृष्टि: नानाजी देशमुख का जीवन निस्वार्थ समाज सेवा का सर्वोच्च आदर्श है। उनका ग्राम विकास दर्शन ही समृद्ध भारत की आधारशिला है।

