आयुर्वेद विमर्श। महर्षि चरक और सुश्रुत की अमर ज्ञान परंपरा हमें सिखाती है कि स्वास्थ्य कोई संयोग नहीं, बल्कि प्रकृति के नियमों के साथ हमारे शरीर का पूर्ण सामंजस्य है। जब भी मौसम बदलता है—जैसे वर्षा से शरद या शरद से हेमंत में प्रवेश—हमारे शरीर में वात, पित्त और कफ का प्राकृतिक संतुलन डगमगा जाता है। इसे आयुर्वेद में ‘ऋतु संधिकाल’ कहा जाता है। यदि इस समय आहार-विहार में सूक्ष्म परिवर्तन कर लिए जाएं, तो मौसमी फ्लू, एलर्जी और संक्रामक रोगों से सहज ही बचा जा सकता है।
ऋतु संधिकाल में जठराग्नि और त्रिदोष का विज्ञान
मौसम के बदलते ही हमारी पाचन शक्ति (जठराग्नि) की क्षमता में परिवर्तन आता है। जब बाहर ठंड बढ़ती है, तो शरीर के भीतर ऊष्मा संचित होने लगती है और जठराग्नि तीव्र हो जाती है। ऐसे समय में यदि व्यक्ति हल्का और रूखा-सूखा भोजन करे, तो वात का प्रकोप बढ़ जाता है जिससे जोड़ों में दर्द, त्वचा का फटना और कब्ज की समस्या होने लगती है।
वहीं शरद ऋतु में पित्त का शमन करने के लिए मधुर, तिक्त और कषाय रसों का सेवन अमृत तुल्य माना गया है। प्रकृति स्वयं हमें संकेत देती है कि कब क्या खाना चाहिए और क्या छोड़ना चाहिए।
“हिताहारविहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः। दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः॥”
— चरक संहिता, शारीरस्थान
त्रिदोष संतुलन के 5 स्वर्णिम नियम
- उष्ण जल और दीपन-पाचन पेय: सुबह सोंठ, दालचीनी और तुलसी से उबला गुनगुना पानी पिएं; यह विषाक्त तत्वों (आम) को बाहर निकालता है।
- प्रतिदिन नस्य कर्म: रात को सोते समय दोनों नासिकाओं में दो-दो बूंद देशी गाय का घी या अणु तेल डालने से मस्तिष्क शांत रहता है और एलर्जी नहीं होती।
- अभ्यंग (स्नेहन): सप्ताह में कम से कम तीन दिन तिल के गुनगुने तेल से संपूर्ण शरीर की मालिश करने से वात दोष शांत होता है और त्वचा कांतिवान बनती है।
- ताजा और मौसमी आहार: बासी, डिब्बाबंद और ठंडे खाद्य पदार्थों से पूरी तरह परहेज करें; गुड़, तिल और सोंठ का उचित मात्रा में सेवन करें।
- प्राणायाम और सूर्य स्नान: प्रातःकाल 15 मिनट ताजी धूप में बैठकर कपालभाति और अनुलोम-विलोम करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है।
निरोगी काया ही जीवन का सच्चा सुख
अंग्रेजी दवाएं केवल लक्षणों को दबाती हैं, जबकि आयुर्वेद रोग के मूल कारण को समाप्त कर शरीर को स्वतः स्वस्थ होने का सामर्थ्य प्रदान करता है।
राष्ट्रवाक् दृष्टि: अपनी दिनचर्या को ऋतु के अनुकूल ढालना ही सनातन स्वास्थ्य विज्ञान का सबसे सरल, अचूक और शाश्वत सूत्र है।


