मुंबई ब्यूरो। मुंबई के प्रतिष्ठित रवींद्र नाट्य मंदिर में आयोजित ‘छत्रपति संवाद: मुंबई संकल्प’ विचार गोष्ठी में शिक्षाविदों, बाल मनोवैज्ञानिकों और साहित्यकारों ने वर्तमान पीढ़ी में तेजी से बढ़ रही मोबाइल फोन की लत पर गंभीर चिंता व्यक्त की। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि बच्चों की मानसिक एकाग्रता, संवेदनशीलता और रचनात्मकता को बचाने के लिए माता-पिता को ‘मोबाइल की जगह पुस्तक’ का संकल्प लेना होगा।
डिजिटल स्क्रीन बनाम मानवीय चेतना का संकट
गोष्ठी में प्रस्तुत किए गए शोध पत्रों से यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि प्राथमिक कक्षाओं के बच्चे प्रतिदिन औसतन 4 से 6 घंटे स्क्रीन पर बिता रहे हैं। रील्स, शॉर्ट्स और हिंसक वीडियो गेम्स के कारण बच्चों में धैर्य की कमी, नींद के विकार, अवसाद और सामाजिक अलगाव तेजी से बढ़ रहा है।
छत्रपति शिवाजी महाराज की बाल्यकाल की शिक्षा का उदाहरण देते हुए वक्ताओं ने याद दिलाया कि कैसे माता जीजाबाई ने उन्हें रामायण, महाभारत और राष्ट्रभक्ति की प्रेरक गाथाएं सुनाकर एक युगपुरुष का निर्माण किया था। आज बच्चों को गैजेट्स थमाकर माता-पिता अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकते।
“जो पीढ़ी पुस्तकें नहीं पढ़ती, वह विचार करना भूल जाती है। जब विचार समाप्त होते हैं, तो चरित्र निर्माण रुक जाता है। बच्चों को शब्दों की खुशबू और पन्नों का स्पर्श लौटाइए।”
— प्रमुख वक्ता, बाल मनोवैज्ञानिक
विचार गोष्ठी के प्रमुख सुझाव और संकल्प
- प्रतिदिन एक घंटा ‘डिजिटल डिटॉक्स’: परिवार में शाम के समय सभी सदस्यों द्वारा फोन बंद कर एक साथ पुस्तक पढ़ने की आदत।
- भारतीय बाल साहित्य का पुनरुद्धार: पंचतंत्र, जातक कथाएं और अमर चित्रकथा जैसी कालजयी रचनाओं को हर घर की लाइब्रेरी में स्थान।
- विद्यालयों में पुस्तकालय अवधि अनिवार्य: डिजिटल क्लासरूम के साथ-साथ पारंपरिक पुस्तकों के वाचन को प्राथमिकता देना।
- उपहार में पुस्तकें देने की परंपरा: जन्मदिन और उत्सवों पर गैजेट्स के स्थान पर अच्छी ज्ञानवर्धक पुस्तकें भेंट करना।
सांस्कृतिक मूल्यों का पुनर्जागरण
गोष्ठी का समापन ‘मुंबई संकल्प’ के साथ हुआ, जिसके तहत स्थानीय स्तर पर मोहल्ला वाचनालयों और बाल संस्कार केंद्रों की स्थापना की जाएगी। यह अभियान पूरे महाराष्ट्र और देश के अन्य राज्यों में भी ले जाया जाएगा।
राष्ट्रवाक् दृष्टि: एक सुदृढ़ और विचारशील राष्ट्र की नींव पुस्तकों के पन्नों पर ही रखी जाती है। बच्चों को स्क्रीन के अंधकार से निकालकर साहित्य के प्रकाश में लाना हमारा सामूहिक कर्तव्य है।

