बेंगलुरु डेस्क। भारत के युवा वैज्ञानिकों और स्टार्टअप इनोवेटर्स ने ग्रामीण भारत और आपदा प्रभावित क्षेत्रों के लिए एक अभूतपूर्व तकनीकी समाधान खोज निकाला है। सौर ऊर्जा से संचालित होने वाले इस अल्ट्रा-लो-कॉस्ट वाटर प्यूरीफायर की मदद से प्रतिदिन 1000 लीटर गंदे या खारे पानी को पूर्णतः पीने योग्य और खनिज-युक्त पानी में बदला जा सकता है। इस संयंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे किसी विद्युत ग्रिड या भारी बैटरी बैकअप की आवश्यकता नहीं है।
सस्ती और टिकाऊ तकनीक का स्वदेशी मॉडल
देश के कई ग्रामीण और तटीय इलाकों में भूमिगत जल में आर्सेनिक, फ्लोराइड और अत्यधिक लवणता की समस्या गंभीर स्वास्थ्य संकट का कारण बनती है। बाजार में उपलब्ध पारंपरिक आरओ संयंत्र बहुत अधिक बिजली की खपत करते हैं और 60% पानी व्यर्थ बहा देते हैं।
युवा टीम द्वारा विकसित इस नए संयंत्र में सौर-थर्मल और नैनो-मेम्ब्रेन तकनीक का अनोखा मिश्रण किया गया है। यह शून्य जल-अपव्यय (Zero Liquid Discharge) सिद्धांत पर कार्य करता है। संयंत्र की लागत पारंपरिक संयंत्रों की तुलना में 70% कम है और इसका रखरखाव स्थानीय ग्रामीण स्वयं कर सकते हैं।
“हमारा लक्ष्य था कि भारत के दूरदराज के किसी भी गांव या बाढ़ प्रभावित इलाके में एक भी बच्चे को अशुद्ध पानी पीने के लिए विवश न होना पड़े। स्वदेशी नवाचार ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।”
— राहुल शर्मा, मुख्य अनुसंधानकर्ता व सह-संस्थापक
संयंत्र के मुख्य तकनीकी लाभ
- 100% सौर संचालित: बिना बिजली वाले ऑफ-ग्रिड गांवों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त।
- जीरो वाटर वेस्टेज: पारंपरिक आरओ की तरह पानी की बर्बादी नहीं, 95% से अधिक जल की रिकवरी।
- आर्सेनिक व फ्लोराइड से मुक्ति: 99.9% बैक्टीरिया, वायरस और भारी धातुओं का पूर्ण निष्कासन।
- पोर्टेबल और आसान संचालन: बाढ़ या प्राकृतिक आपदा के समय आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है।
वैश्विक स्तर पर भारतीय मेधा की सराहना
इस नवाचार को कई अंतरराष्ट्रीय पेटेंट और पर्यावरण मंचों से पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। नीति आयोग और जल शक्ति मंत्रालय ने इस तकनीक को ग्रामीण जल जीवन मिशन में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
राष्ट्रवाक् दृष्टि: भारतीय युवाओं की यह वैज्ञानिक दृष्टि दर्शाती है कि आत्मनिर्भर भारत का भविष्य नवाचार और सामाजिक सरोकारों के सशक्त कंधों पर सुरक्षित है।

