नई दिल्ली डेस्क। भारतीय विज्ञान और वैदिक वांग्मय के गहन संबंधों को उजागर करने वाले बहुप्रतीक्षित शोध ग्रंथ ‘वेदों में निहित विज्ञान और आधुनिक भौतिकी’ का राजधानी में एक गरिमामय समारोह में भव्य लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर देश के शीर्ष परमाणु वैज्ञानिकों, भौतिकविदों और संस्कृत के मूर्धन्य विद्वानों ने एक मंच पर आकर इस बात को रेखांकित किया कि प्राचीन भारतीय ऋषियों की दृष्टि केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहन वैज्ञानिक और प्रायोगिक थी।
क्वांटम भौतिकी और उपनिषदिक अद्वैत दर्शन
शोध ग्रंथ में प्रमुखता से दर्शाया गया है कि आधुनिक क्वांटम भौतिकी के जनक कहे जाने वाले नील्स बोर, श्रोडिंगर और रॉबर्ट ओपेनहाइमर जैसे पश्चिमी वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया था कि वेदों और उपनिषदों के विचार ब्रह्मांड के सूक्ष्म स्तर को समझने में प्रकाशस्तंभ का कार्य करते हैं।
ग्रंथ में ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में वर्णित सृष्टि की उत्पत्ति, सूर्य सिद्धांत में समय की सूक्ष्म गणनाएं, महर्षि कणाद का वैशेषिक दर्शन में परमाणु सिद्धांत और आयुर्वेद की त्रिदोष प्रणाली का आधुनिक वैज्ञानिक परीक्षण प्रस्तुत किया गया है। यह पुस्तक मिथक और तथ्य के अंतर को स्पष्ट करते हुए विशुद्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर लिखी गई है।
“मैं उपनिषदों की शरण में जाता हूं जब मुझे आधुनिक भौतिकी के उलझे हुए प्रश्नों का उत्तर खोजना होता है। वेदों की ब्रह्मांडीय दृष्टि आज के भौतिक विज्ञान से कहीं अधिक समग्र और विराट है।”
— एर्विन श्रोडिंगर (नोबेल विजेता भौतिकविद के संस्मरण से)
शोध ग्रंथ के प्रमुख अनुसंधान बिंदु
- नासदीय सूक्त और बिग बैंग थ्योरी: शून्य से सृष्टि के विस्तार की वैदिक अवधारणा और आधुनिक कॉस्मोलॉजी की समानता।
- प्रकाश की गति की वैदिक गणना: सायण भाष्य में सूर्य के प्रकाश की गति का गणितीय निरूपण आधुनिक माप के 99.9% समतुल्य।
- कणाद का वैशेषिक परमाणुवाद: पदार्थ के सूक्ष्म कणों, गति के नियमों और तत्वों के संयोजन का प्राचीन सिद्धांत।
- खगोल विज्ञान और काल गणना: युग, मन्वंतर और कल्प के माध्यम से अरबों वर्षों के समय चक्र की अचूक गणना।
भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनर्मूल्यांकन
यह शोध ग्रंथ भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अंतर्गत भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) के संवर्धन में एक ऐतिहासिक आधारशिला बनेगा। यह युवाओं को हीनभावना से मुक्त कर अपनी बौद्धिक धरोहर पर वैज्ञानिक गर्व करने की प्रेरणा देता है।
राष्ट्रवाक् दृष्टि: विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य को खोजने की दो पूरक दृष्टियां हैं। वेदों का विज्ञान इसका सबसे प्रामाणिक प्रमाण है।

