विशेष संपादकीय। जब भी भारत वैश्विक स्तर पर तेजी से आर्थिक और रणनीतिक शक्ति के रूप में उभरता है, तो पश्चिमी वित्तीय लॉबी और उनके पालतू बुद्धिजीवियों का एक वर्ग सक्रिय होकर भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को संदिग्ध साबित करने के कुत्सित प्रयास में जुट जाता है। अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस और उनकी वित्तपोषित ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन्स’ द्वारा भारत के चुनावों, न्यायपालिका और अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप करने के बार-बार किए जाने वाले प्रयास अब किसी से छिपे नहीं हैं।
‘ओपन सोसाइटी’ का पाखंड और नैरेटिव युद्ध
कथित मानवाधिकार और लोकतंत्र के संरक्षण का मुखौटा पहनकर चलने वाले इन विदेशी तंत्रों का वास्तविक उद्देश्य उन देशों में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना होता है, जो पश्चिमी एकाधिकार को चुनौती देने का साहस दिखाते हैं। भारत में जब भी कोई ऐतिहासिक सुधार लागू होता है—चाहे वह धारा 370 की समाप्ति हो, सीएए हो, या स्वदेशी रक्षा विनिर्माण—अचानक अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत को ‘तानाशाही’ और ‘असहिष्णु’ सिद्ध करने वाले आलेखों की बाढ़ आ जाती है।
तिहाड़ जेल में बंद देशविरोधी तत्वों के बयानों को पश्चिमी अकादमिक जगत में महिमामंडित करना और भारत के सामाजिक ताने-बाने को जाति व धर्म के आधार पर विभाजित करने के लिए भारी विदेशी फंडिंग मुहैया कराना इस हाइब्रिड युद्ध के मुख्य औजार हैं।
“यह वैचारिक युद्ध सीमाओं पर नहीं, बल्कि हमारे विश्वविद्यालयों, मीडिया और न्यायालयों के परिसरों में लड़ा जा रहा है। अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पहचानना ही इस षड्यंत्र का सबसे बड़ा उत्तर है।”
— वरिष्ठ राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ
भारत-विरोधी विदेशी तंत्र की कार्यप्रणाली के 4 चरण
- काल्पनिक नैरेटिव का निर्माण: पश्चिमी विश्वविद्यालयों में संदिग्ध थिंक टैंकों द्वारा भारत की रैंकिंग को कृत्रिम रूप से गिराना।
- घरेलू तत्वों की फंडिंग: गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के माध्यम से सरकार की हर नीति का विरोध।
- आर्थिक संस्थानों पर प्रहार: भारत के शेयर बाजार, राष्ट्रीय बैंकों और प्रमुख कॉरपोरेट्स को शॉर्ट-सेलिंग रिपोर्टों से अस्थिर करना।
- न्यायिक प्रक्रियाओं का राजनीतिकरण: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर याचिकाएं डालकर भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने का दबाव बनाना।
भारत की सजगता और सुरक्षा एजेंसियों की सख्ती
भारत सरकार ने एफसीआरए (FCRA) नियमों को सख्त कर विदेशी फंडिंग के अवैध प्रवाह पर जो अंकुश लगाया है, उससे इस सिंडिकेट में भारी बौखलाहट है। भारत के जागरूक नागरिक और राष्ट्रीय मीडिया अब इन छद्म-लोकतांत्रिक मुखौटों को भली-भांति पहचानते हैं।
राष्ट्रवाक् दृष्टि: भारत का लोकतंत्र 140 करोड़ नागरिकों के आशीर्वाद से सुरक्षित है। किसी विदेशी अरबपति की तिजोरी हमारे राष्ट्र के भाग्य का फैसला नहीं कर सकती।

